
मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल दुनिया से दूर बच्चों ने प्रकृति को किया स्क्रॉल: तारों भरी रात में जगनुओं की रोशनी में देखा जंगल का सुकून
बलौदा बाजार। आज की आधुनिक डिजिटल दुनिया में जहां बच्चों की सुबह मोबाइल से शुरू होकर रात इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीच गुजरती है। वहीं बलौदा बाजार जिले के दूरस्थ और नेटवर्क विहीन देवपुर परिक्षेत्र में बच्चों के लिए एक ऐसे समर कैंप का आयोजन किया गया जिसने बिल्कुल अलग अनुभव कराया। यहां बच्चों ने मोबाइल की स्क्रीन नहीं बल्कि जुगनू की रोशनी में प्रकृति के बीच जंगल, तितलियां, पेड़-पौधे, चिड़ियों के कलरव के बीच टिमटिमाते तारों के साथ खुले आसमान को “स्क्रॉल” किया।

हम बात कर रहे हैं बलौदा बाजार वनमण्डल द्वारा आयोजित उस समर कैंप का जिसमें कक्षा 6वीं से 10वीं तक के बच्चों ने हिस्सा लिया। देवपुर परिक्षेत्र में नेचर कैंप के आसपास में लगाए गए इस कैंप का मुख्य उद्देश्य ही बच्चों को आधुनिक संसाधनों से कुछ समय के लिए दूर रखकर उन्हें प्रकृति, ग्रामीण जीवन और पारंपरिक संस्कृति से जोड़ना था। यह कैंप बच्चों को उस दौर की जिंदगी का अनुभव कराया जब न इंटरनेट था, न सोशल मीडिया और न ही हर पल हाथ में मोबाइल फोन।

आधुनिक दौर में आज जहां बच्चों का अधिकांश समय मोबाइल, टीवी, इंटरनेट और कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने बीत रहा है। वहीं बलौदा बाजार जिले के दूरस्थ और नेटवर्क विहीन देवपुर परिक्षेत्र में जब समर कैंप आयोजित करने की घोषणा की तो रजिस्ट्रेशन कराने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। बलौदा बाजार जिले के अलावा रायपुर सहित अन्य शहरों और राज्यों से आए बच्चों को प्रकृति और पारंपरिक जीवनशैली से जोड़ने की अनूठी पहल बनकर सामने आया है। यह समर कैंप केवल मनोरंजन या घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य बच्चों को प्रकृति, पर्यावरण, ग्रामीण संस्कृति और पारंपरिक जीवन मूल्यों को करीब से समझाना है। बच्चों को आधुनिक संसाधनों और तकनीक से कुछ समय के लिए ब्रेक देकर उन्हें इन सुविधाओं से दूर रखकर ऐसा अनुभव कराया जा रहा है जैसा 1990 के दशक और उससे पहले के समय में बच्चों का जीवन हुआ करता था। कैंप के दौरान बच्चों ने महसूस किया कि बिना मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के भी जीवन में आनंद, सुकून और सीखने के अनगिनत अवसर मौजूद हैं।
नेटवर्क विहीन जंगल में बच्चों ने बिताई रात
देवपुर परिक्षेत्र के घने जंगलों के बीच आयोजित इस समर कैंप की सबसे खास बात यह है कि यहां मोबाइल नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं है। शहरों की भागदौड़, ट्रैफिक और लगातार डिजिटल दुनिया से जुड़े रहने वाले बच्चे जब जंगल के बीच पहुंचे तो उनके लिए यह बिल्कुल अलग अनुभव रहा।

वालियंटर्स बताते हैं कि कई बच्चे तो मोबाइल के इतने आदि हो चुके थे, कि उनकी पहली रात बहुत कठिनाई में बीती कई बिना इंटरनेट के रोने लगे। उनके लिए अलग अलग इवेंट किए गए जिसमें वे व्यस्त होकर सुकून तलाशने लगे। समय बीतने के साथ सभी एक दूसरे से परिचित हुए और फिर सब साथ मिलकर विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। रात के समय बच्चे कैंप में ही रुके, जहां उन्होंने खुले आसमान के नीचे चमकते तारों को देखा, जंगलों में टिमटिमाते जुगनुओं को निहारा और प्रकृति की शांत व ताजी हवा के बीच समय बिताया। बच्चों ने बताया कि शहरों में इतना शांत वातावरण नहीं मिलता है। जंगल के बीच बिताए गए इन पलों ने बच्चों को मानसिक सुकून और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव दिया।
बच्चों को महसूस कराया गया “नानी के घर जैसी छुट्टियां”
कैंप में शामिल बच्चों को “नानी के घर बिताई जाने वाली पुरानी गर्मी की छुट्टियों” जैसा महसूस कराया गया। रात में किस्से-कहानियों का दौर तो सुबह से जंगल और प्रकृति के बीच समय बिताना क्योंकि यहां न टीवी है, न वीडियो गेम और न ही इंटरनेट की दुनिया का शोर। वॉलेंटियर्स बताते हैं कि बच्चे पूरे उत्साह के साथ गतिविधियों में भाग ले रहे हैं।
वन विभाग का उद्देश्य भी यही है कि बच्चे कुछ समय के लिए आधुनिक संसाधनों से दूर होकर प्राकृतिक और सामाजिक जीवन को समझें। बच्चों ने जंगलों के बीच रहकर यह महसूस किया कि असली खुशी केवल डिजिटल दुनिया में नहीं बल्कि प्रकृति और लोगों के बीच भी मिलती है।
ग्रामीण जीवन को करीब से समझा
समर कैंप के दौरान बच्चों को आसपास के गांवों में भी ले जाया गया, जहां उन्होंने ग्रामीण परिवेश और पारंपरिक जीवनशैली को नजदीक से देखा। विभिन्न शहरों और राज्यों से आए बच्चों के लिए यह अनुभव बेहद खास रहा। बच्चों ने देखा कि गांवों में आज भी किस प्रकार मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया जाता है। उन्हें यह भी बताया गया कि पहले गैस चूल्हों के अभाव में पूरा खाना लकड़ी और मिट्टी के चूल्हों पर तैयार किया जाता था। ग्रामीण महिलाओं ने बच्चों को पारंपरिक ढंग से खाना पकाने की प्रक्रिया भी दिखाई। इसके अलावा बच्चों ने अनाज कूटने के लिए इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक “ढेकी” और घरों में पिसाई के लिए उपयोग किए जाने वाले “जाता” को भी देखा और समझा। गांवों के कुएं, पारंपरिक रहन-सहन, घरेलू व्यवस्थाएं और ग्रामीण जीवन की सादगी बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र रही।

जनजातीय संस्कृति और लोकगीतों से रूबरू हुए
कैंप में शामिल होने वाले बच्चे जब गांव पहुंचे तो ग्रामीणों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया गया। वनांचल और जनजातीय गांवों की पारंपरिक संस्कृति, लोकगीत और वाद्य यंत्रों की प्रस्तुतियों ने बच्चों को काफी प्रभावित किया। ग्रामीण कलाकारों ने भजन, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य की प्रस्तुति दी। ढोल, झांझ सहित अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर बच्चे भी खुद को रोक नहीं पाए और ग्रामीणों के साथ झूमते-नाचते नजर आए। इस दौरान बच्चों ने जनजातीय संस्कृति की विविधताओं और लोक परंपराओं को करीब से समझा।
जंगल में पैदल यात्रा कर प्रकृति को जाना
समर कैंप के दौरान बच्चों को देवपुर परिक्षेत्र के जंगलों में पैदल भ्रमण भी कराया गया। वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने बच्चों को जंगल, पेड़-पौधों और प्राकृतिक चक्र के बारे में विस्तार से जानकारी दी। बच्चों को बताया गया कि किस प्रकार छोटे बीज धीरे-धीरे अंकुरित होकर पौधे और फिर विशाल वृक्ष बनते हैं। बारिश के दौरान पहाड़ों और जंगलों से बहने वाले पानी से नाले और नदियों के बनने की प्रक्रिया को भी समझाया गया। इसके साथ ही बच्चों को जंगलों में मिलने वाली तितलियों की विभिन्न प्रजातियों, उनके रंग, जीवन चक्र और प्रकृति में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी दी गई। बच्चों ने चिड़ियों की आवाज सुनकर उनकी पहचान करना भी सीखा। जंगल में पक्षियों की आवाज, पेड़ों की हरियाली और प्राकृतिक वातावरण बच्चों के लिए रोमांचकारी अनुभव बना रहा।
बच्चों की रचनात्मक प्रतिभा निखारने हो रही विभिन्न गतिविधियां
इस समर कैंप केवल प्रकृति भ्रमण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों की रचनात्मक प्रतिभाओं को निखारने के लिए भी विभिन्न गतिविधियां आयोजित की गईं। कैंप में फोटोग्राफी, डांस, नाटक, पेंटिंग और अन्य रचनात्मक विधाओं का प्रशिक्षण दिया गया। बच्चों को प्राकृतिक दृश्यों के साथ वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी करने, जंगल और ग्रामीण जीवन को कैमरे में कैद करने और अपनी कल्पनाशक्ति को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला। इसके अलावा सांस्कृतिक और समूह गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में आत्मविश्वास और सामूहिक सहभागिता की भावना विकसित करने का प्रयास किया गया।
बारनवापारा सफारी और सिरपुर का किया शैक्षणिक भ्रमण
कैंप में शामिल बच्चों को बारनवापारा अभ्यारण्य में सफारी कराई गई। यहां बच्चों ने वन्यजीवों को करीब से देखा और उनके संरक्षण के महत्व को समझा। वन विभाग के अधिकारियों ने बच्चों को जंगल और वन्यजीवों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता के बारे में जानकारी दी। इस जंगल में मिलने वाले गौर, भालू, चीतल और हिरणों के साथ ही काले हिरणों के झुंड को देखना बच्चों के लिए रोमांचकारी रहा। इसके अलावा बच्चों को ऐतिहासिक नगरी सिरपुर का भ्रमण भी कराया गया। यहां उन्होंने पुरातत्व, प्राचीन भारतीय सभ्यता और ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में जाना। इस भ्रमण के माध्यम से बच्चों को इतिहास, संस्कृति और विरासत से जुड़ने का अवसर मिला।
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प्रकृति और पर्यावरण को समझने की नई सीख
समर कैंप के बच्चों के अनुभवों में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। बच्चों ने बताया कि शुरुआत में उन्हें मोबाइल और इंटरनेट के बिना रहना कठिन लगा, लेकिन धीरे-धीरे वे प्रकृति और कैंप की गतिविधियों में इतने रम गए कि उन्हें डिजिटल दुनिया की कमी महसूस ही नहीं हुई। जंगल को करीब से समझने के साथ ही उन्हें इस कैंप तितलियों की पहचान, उनके नाम, साथ ही पक्षियों की आवाज, रंग उनके आकार के साथ भोजन और , पेड़-पौधे, जंगल और वन्यजीव केवल प्रकृति की सुंदरता नहीं बल्कि मानव जीवन के लिए बेहद जरूरी हैं। जंगलों और पर्यावरण का संरक्षण भविष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह संदेश भी बच्चों तक पहुंचा।
Author: UnfearNews
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