रियल इस्पात हादसा: गर्म कोयले की राख से मारे गए मजदूरों के परिजनों के जख्म पर घीस दिया गया मुआवजे का मरहम

रियल इस्पात हादसा: गर्म कोयले की राख से मारे गए मजदूरों के परिजनों के जख्म पर घीस दिया गया मुआवजे का मरहम

रियल इस्पात हादसा: गर्म कोयले की राख से मारे गए मजदूरों के परिजनों के जख्म पर घीस दिया गया मुआवजे का मरहम

इंडस्ट्रियल डेस्क|बलौदा बाजार

रियल इस्पात एंड एनर्जी प्लांट में 22 जनवरी की सुबह 6 मजदूरों के लिए काल बनकर आया। हालांकि स्थानीय लोगों का दावा है कि मौत के आंकड़े अधिक हैं प्रशासन और प्रबंधन ने साठगांठ कर मृतकों की संख्या कम बताए क्योंकि मुआवजा देना पड़ता। क्योंकि मुआवजा जिंदगी से अब बड़ी हो गई है।

रियल इस्पात हादसा: गर्म कोयले की राख से मारे गए मजदूरों के परिजनों के जख्म पर घीस दिया गया मुआवजे का मरहम
रियल इस्पात हादसा

रियल इस्पात एंड एनर्जी प्लांट में हुए हादसे के बाद से बलौदा बाजार में लगी तमाम फैक्ट्रियों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। लोगों का आरोप है कि रियल इस्पात एंड एनर्जी में ऑफिशियल तौर पर उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। यह बात प्रशासनिक अधिकारियों और उद्योग विभाग के तरफ से कहा गया। लेकिन वहां पिछले कई माह से उत्पादन चल रहा था। स्थानीय लोगों और निर्माण कार्य के दौरान यहां काम कर रहे मजदूरों का कहना है कि निर्माण में लगे मजदूरों को निर्माण कार्य पूरा होने के बाद से हटा दिया गया है। स्थानीय श्रमिकों को हटाते समय कंपनी ने दावा किया था कि अब सिर्फ तकनीकी रूप से विशेषज्ञ मजदूरों को ही लाने का काम किया जाएगा। स्थानीय मजदूरों को काम से बाहर करने के बाद चौकीदार से लेकर मजदूरी पर रखे गए ज्यादातर मजदूर बिहार और झारखंड से लाए गए हैं। जिनके द्वारा गेट पर घटना वाले दिन दुर्घटना का कवरेज करने पहुंचे पत्रकार साथियों के साथ स्थानीय लोगों से धक्का मुक्की की गई थी।

बाहरी मजदूरों, कंपनी से उत्पादन शुरू होने, दुर्घटना के बाद कंपनी प्रबंधन का संदिग्ध रवैया को देखने के बाद स्थानीय लोगों का आरोप है कि हादसे की जानकारी होते ही पूरा प्रशासनिक अमला रियल इस्पात प्लांट में पहुंच गया। कलेक्टर दीपक सोनी ने एसडीएम के नेतृत्व में जांच टीम बना दिए, किल्लन नंबर एक जहां हादसा हुआ था उसे सील कर दिए, लेकिन प्रबंधन के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई आज तक स्पष्ट नहीं हुआ है।

बता दें कि प्रशासनिक जांच में सामने आया है कि कंपनी में उत्पादन किया जा रहा था। जबकि इसकी जानकारी उद्योग और इंडस्ट्री विभाग को नहीं दी गई थी। मतलब स्पष्ट है कि कंपनी प्रबंधन मनमानी तरीके से उद्योग चला रहे थे। प्रशासन के तरफ से करवाई क्या की गई इस पर अगर बात की जाए तो पता चलता है कि प्रशासन ने जिस कलर नंबर एक को सील किया था उसे भी 2 दिन के अंदर ही कंपनी प्रबंधन ने हटा दिया और वहां पर साफ सफाई करा दिया। क्योंकि जब कांग्रेस का जांच दल वहां पर पहुंचा तो जिस जगह पर पहले राख का मलबा पड़ा हुआ था वहां पर कोई भी मलबा दिखाई नहीं दिया। अब आते हैं हादसा वाले दिन की बात हादसे में मारे गए मजदूर के परिजनों के आने का इंतजार किए बिना ही प्रशासन ने हड़बड़ी में रात में पोस्टमार्टम कराया।

कंपनी के जानकार कहते हैं कि जब भी कोई हादसे होते हैं पोस्टमार्टम के लिए परिजनों का इंतजार किया जाता है, इस घटना में मारे जाने वाले लोग बाहरी थे, गरीब आदिवासी भुइयां समुदाय से आते थे इसलिए परिजनों की गैर मौजूदगी में ही शवों का पोस्टमार्टम करा दिया गया। क्योंकि प्रशासन को पता है कि बिहार से कोई यहां आवाज उठाने नहीं आएगा उनके जख्मों पर मुआवजा का मरहम घीस दिया गया। स्थानीय विशेषज्ञों का सवाल है कि आखिर क्या हड़बड़ी थी प्रशासन को जो रात में पोस्टमार्टम कराया, परिजनों के आने का इंतजार कर लेते, ऐसा लगता है जैसे प्रशासन पर कंपनी प्रबंधन का कोई दबाव था कि रात में ही पोस्टमार्टम कराया जाए। प्रशासन की भूमिका पर सवालों का तूफान खड़ा हो गया है। परिजनों की गैरमौजूदगी में रात के अंधेरे में पोस्टमार्टम, बिना लाइसेंस वाले ठेकेदार, सील इलाके की सफाई और पंद्रह दिन बाद भी किसी की गिरफ्तारी न होना—इन सबने पूरे मामले को और संदेहास्पद बना दिया है।

बलौदा बाजार जिले में औद्योगिक इकाइयों में बाहरी मजदूरों की बढ़ती संख्या और स्थानीय श्रमिकों को लगातार काम से बाहर किए जाने का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में है। इसी बीच रियल इस्पात एंड एनर्जी प्लांट में काम कर रहे एक मजदूर की मौत ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और कंपनी प्रबंधन की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

सूत्रों और स्थानीय लोगों के मुताबिक, हादसे के बाद परिजनों की अनुपस्थिति में रात के समय डॉक्टरों की विशेष टीम से पोस्टमार्टम कराया गया और शव को साथियों के हवाले कर रवाना कर दिया गया। यह प्रक्रिया कई सवाल खड़े करती है—आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? क्या किसी दबाव में चिकित्सा विभाग ने नियमों में ढील दी? और यदि सब कुछ नियमानुसार था तो दिन के उजाले में परिजनों के सामने कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

प्रशासन और कंपनी प्रबंधन मुआवजे की घोषणा को लेकर प्रचार कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अलग बताई जा रही है। आरोप है कि मजदूरों को लाने वाला ठेकेदार खुद लाइसेंसधारी नहीं है। इसके बावजूद अब तक न तो किसी ठेकेदार की गिरफ्तारी हुई है और न ही कंपनी प्रबंधन के खिलाफ कोई ऐसी सख्त कार्रवाई सामने आई है जो मिसाल बन सके।

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स्थानीय श्रमिक संगठनों का कहना है कि प्रबंधन कम मजदूरी पर बाहरी मजदूरों को लाकर स्थानीय युवाओं को बाहर कर रहा है। कुछ समय पहले ही बड़ी संख्या में स्थानीय मजदूरों को हटाकर अन्य राज्यों से लाए गए कामगारों को जोखिमभरे क्षेत्रों में तैनात किया गया था। आरोप यह भी है कि अपर्याप्त प्रशिक्षण के बावजूद इन मजदूरों को खतरनाक यूनिटों में काम कराया गया, जिससे हादसे की आशंका और बढ़ गई।
मामले में उद्योग विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बताया जा रहा है कि जिस किलन नंबर एक को सील किया गया था, वहां कुछ ही समय में पूरी सफाई कर दी गई। सवाल उठ रहा है कि सील क्षेत्र में इस तरह का काम कैसे हो गया। साथ ही यह भी चर्चा है कि उद्योग विभाग को जानकारी दिए बिना ही प्लांट में उत्पादन शुरू कर दिया गया था। यदि ऐसा है तो करोड़ों रुपये के उत्पादन के दौरान सरकार को राजस्व का कितना नुकसान हुआ? क्या जीएसटी का सही भुगतान किया गया या कर चोरी भी इस मामले का हिस्सा है—इन बिंदुओं पर अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।

स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि जनप्रतिनिधियों और कुछ प्रभावशाली वर्गों ने खुलकर विरोध क्यों नहीं किया। सवाल उठ रहे हैं कि क्या कंपनी ने किसी तरह का लाभ देकर आवाजें खामोश कराईं? वहीं दस दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस के हाथ खाली होने से आक्रोश और गहरा गया है।

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क्षेत्र के नागरिकों और मजदूर संगठनों का कहना है कि केवल मुआवजे की घोषणा से किसी की जान जाने की भरपाई नहीं हो सकती। वे मांग कर रहे हैं कि दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी हो, कंपनी प्रबंधन की जिम्मेदारी तय की जाए और लापरवाही सामने आने पर प्लांट को सील किया जाए। अब पूरा जिला यही पूछ रहा है—कब पुलिस आरोपियों के गिरेबान तक पहुंचेगी? कब प्रशासन पारदर्शी जांच कर सच सामने लाएगा? और आखिर बलौदा बाजार के मजदूरों का शोषण कब रुकेगा?

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Author: UnfearNews

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