छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों का कत्लेआम: बाघ, तेंदुआ और गौर तक सुरक्षित नहीं, प्रदेश में शिकारियों के हौसले बुलंद

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों का कत्लेआम: बाघ, तेंदुआ और गौर तक सुरक्षित नहीं, प्रदेश में शिकारियों के हौसले बुलंद

प्रशासनिक रिपोर्टर|रायपुर

छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण के दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। राज्य के अलग–अलग वन क्षेत्रों में बाघ, तेंदुए और संरक्षित वन्यप्राणी गौर के शिकार की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। जिससे वन विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालात ऐसे हैं शिकारी खुलेआम संरक्षित वन्यजीवों का शिकार कर रहे हैं और विभागीय अमला मूकदर्शक बना हुआ है।

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों का कत्लेआम
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर शिरीष डामरे द्वारा जारी की गई यह तस्वीर।

वन विभाग के अधिकारी एक ओर टूरिज्म को बढ़ावा देने के नाम पर जंगलों में करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं जंगलों में बाघ, तेंदुआ और गौर जैसे संरक्षित वन्यप्राणियों का खुलेआम शिकार हो रहा है। भोरमदेव अभ्यारण्य से लेकर सूरजपुर और खैरागढ़ तक शिकार की घटनाएं यह साबित करती हैं कि विभागीय निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित है। पर्यटन के नाम पर आयोजन, प्रचार और ठेकों का खेल तो चल रहा है, लेकिन वन्यजीवों की सुरक्षा प्राथमिकता नहीं बन पाई है। यदि यही हाल रहा, तो टूरिस्ट को दिखाने को जंगल रहेंगे, जानवर नहीं।

भोरमदेव अभ्यारण्य में बर्बरतापूर्वक गौर का शिकार

कबीरधाम जिले के बोड़ला विकासखंड अंतर्गत भोरमदेव अभ्यारण्य में शिकारियों ने अपनी बर्बरता दिखाई है। कबीरधाम में अवैध रूप से बिछाई गई करेंट लाइन की चपेट में आकर दो गौर की दर्दनाक मौत हो गई। बताया जा रहा है कि शिकारियों ने जंगल में बिजली का तार बिछाया था, जिसमें फंसने से दोनों गौर मौके पर ही मारे गए। चिंताजनक बात यह है कि गत माह में यह दूसरी घटना है। बीते दो महीनों में चार गौर शिकारियों की भेंट चढ़ चुके हैं, इसके बावजूद वन विभाग समय रहते न तो शिकारियों को पकड़ सका और न ही जंगल में प्रभावी निगरानी सुनिश्चित कर पाया।

सूरजपुर में बाघ का शिकार, दांत–नाखून लेकर शिकारी फरार

उत्तर छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से बाघ के शिकार की सनसनीखेज घटना सामने आई है। शिकार के बाद शिकारी बाघ के दांत और नाखून काटकर ले उड़े। बाघ जैसे राष्ट्रीय पशु का शिकार होना न केवल राज्य बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों का कत्लेआम
सूरजपुर के जंगल में बाघ का हुआ शिकार।

यह घटना बताती है कि अंतरराज्यीय वन्यजीव तस्करी गिरोह राज्य में कितने सक्रिय हैं और उन पर अंकुश लगाने में विभाग पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। यह सब उस समय हो रहा है जबकि विभाग दावा कर रहा है कि हम बाघों की आने वाले समय में गणना करने वाले हैं। बता दें कि वर्ष 2026 में बाघों की गणना होनी है जिसके लिए तमाम तैयारियां की जा रही हैं।

खैरागढ़ वनमंडल में तेंदुए का शिकार, पंजा-जबड़ा काट ले गए

खैरागढ़ वनमंडल क्षेत्र में भी तेंदुए के शिकार का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार शिकारी तेंदुए के चारों पंजे और जबड़ा काटकर फरार हो गए। यह घटना इस ओर इशारा करती है कि वन्यजीव अंगों की तस्करी करने वाले गिरोह बेखौफ होकर जंगलों में सक्रिय हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी अपने दायित्वों से आंख मूंदे टूरिज्म को बढ़ाने के लिए हाथ पांव पटक रहे हैं।

वन विभाग की भूमिका पर सवाल

वन्यजीव प्रेमियों के तरफ से इन घटनाओं के बाद यह सवाल उठाना स्वाभाविक हो गया है कि वनमंडल अधिकारी, मुख्य वन संरक्षक और उच्च अधिकारी आखिर क्या कर रहे हैं? क्या वे तकिए से सिर टिकाकर गहरी नींद में हैं? यदि नहीं, तो फिर उनके रहते इतनी बड़ी घटनाएं कैसे हो रही हैं? जंगलों की सुरक्षा, गश्त, मुखबिर तंत्र और तकनीकी निगरानी की हकीकत इन मामलों ने उजागर कर दी है। सबसे बड़ी बात यह कि जिस जंगल में बाघ होते हैं उन्हें ट्रैक किया जाता है, ट्रैक करने के लिए सैकड़ों कैमरे लगाए जाते हैं, लेकिन इसके बाद भी किसी भी मामले में शिकारियों का नहीं आना, विभागीय मिली भगत की ओर इशारा करता है।

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मंत्रियों से जवाब की मांग

छत्तीसगढ़ शासन का वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग आखिर किस उद्देश्य के लिए है, जब संरक्षित वन्यजीव ही सुरक्षित नहीं हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप और राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्रियों के संज्ञान में यह विषय लाया जाना चाहिए। वन्यजीव प्रेमियों का आरोप यह भी है कि कुछ अधिकारी राजनीतिक संरक्षण के आशीर्वाद से जमे हुए हैं और इसी कारण कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जा रही हैं।

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कठोर कार्रवाई की जरूरत

वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो छत्तीसगढ़ के जंगलों से दुर्लभ प्रजातियां तेजी से खत्म हो जाएंगी। जरूरत है कि शिकारियों के साथ-साथ लापरवाह अधिकारियों पर भी कड़ी कार्रवाई हो, निगरानी तंत्र मजबूत किया जाए और जंगलों में वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। अन्यथा वन्यजीव संरक्षण केवल फाइलों और भाषणों तक ही सिमटकर रह जाएगा।

बलौदा बाजार में गौर का पैर काटकर ले गए थे शिकारी

बलौदा बाजार वनमण्डल में एक माह पहले शिकारियों ने संरक्षित वन्यजीव गौर का शिकार किया था और उसका पैर काटकर ले गए। इसके बाद से प्रदेश में लगातार घटनाएं हो चुकी हैं। इससे पहले चीतल का शिकार यहां हुआ था। वन्यजीव प्रेमियों ने विभाग को चिट्ठी लिखकर गश्त बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन विभाग के अधिकारी खुद के सामने किसी हर किसी को नीचा समझते रहे और परिणाम लगातार वन्यजीवों का शिकार होता रहा।

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Author: UnfearNews

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