
बिजली बिल पर गरमाई सियासत: कांग्रेस सड़कों पर उतर भरेगी हुंकार, जनता की जेब पर असल में बिजली का करंट या हो रही राजनीति
पॉलिटिकल रिपोर्टर| बलौदाबाजार
मुगल बादशाह अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक और एक प्रसिद्ध कवि रहीम दास की पंक्ति है “एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय। रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय।” इन्हीं पंक्तियों से प्रेरित कांग्रेस दिख रही है। सिर्फ एक मुद्दा बिजली बिल की बढ़ोतरी को केंद्र में रखकर सरकार को घेर रही है। इस एक मुद्दा से जहां कांग्रेस को जन समर्थन मिलने की उम्मीद है , वहीं इसी सरकार पर दबाव बनाने में जुटी हुई है। अब सरकार पर इससे कितना फर्क पड़ता है यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन कांग्रेस इस एक मुद्दे से न सिर्फ सरकार के निर्णय को जन विरोधी बता पाने में मदद मिल गई है बल्कि उन मुद्दों को भी जोड़ ली है, जिसमें प्रदेश से कोयला लेकर प्रदेश की जनता को महंगी बिजली दी जानी है।

प्रदेश की राजनीति में बिजली बिल ने करंट पैदा कर दी है। या यह कहे कि प्रदेश की राजनीति बिजली बिल के करंट से स्टार्ट हो गई है। सरगुजा से बस्तर तक बिजली बिल की बढ़ोतरी पर हंगामा है। चर्चा है कि सरकार एक कदम उठाई है जिससे जनता की जेब पर बिजली का करंट लगना तय है। इस झटके की जानकारी लगते ही कांग्रेस सदन के बाद अब सड़क पर उतर आई है। बहरहाल मुद्दा यह है कि एक बार फिर सरकार जनता की जेब पर बिजली का झटका देने वाली है, जिसकी सुगबुगाहट तेज हो गई है। और कांग्रेस जनता के बीच जाकर अपनी खोई हुई जनसमर्थन जुटाने की कोशिश में जुट गई है।
राज्य में बिजली बिलों को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। आरोप है कि प्रदेश की सरकार द्वारा पूर्व से मिल रही हाफ बिजली बिल योजना में बदलाव करते हुए 400 यूनिट तक की सब्सिडी खत्म कर रही है। जिससे आम जनता को अब पूरा बिजली बिल चुकाना पड़ेगा। इसी निर्णय के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने मोर्चा खोल दिया है।
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने इस फैसले को जनता के साथ विश्वासघात बताया है और पार्टी ने 6-7 अगस्त को प्रदेशव्यापी आंदोलन की घोषणा की है। इस दौरान कांग्रेस प्रेस वार्ता, विरोध प्रदर्शन और बिजली विभाग के दफ्तरों के बाहर पुतला दहन जैसे कार्यक्रम करेगी।
जनता की बढ़ी परेशानी: योजना में बदलाव से राहत गई, महंगाई आई
सरकार की योजना में बदलाव ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। अब वे हर यूनिट का पूरा शुल्क भरने को मजबूर हैं। गर्मी के मौसम में बिजली की खपत बढ़ जाती है और ऐसे में 400 यूनिट पार करना आम बात है। पहले जहां इन पर हाफ बिल आता था, अब उन्हें दोगुना बिल देना होगा। सही मायने में यह फैसला गरीबों, मध्यमवर्गीय परिवारों, छोटे व्यापारियों, ग्रामीणों और छात्रावासों पर सीधा असर डाल रहा है। अधिक भुगतान करने से घरेलू बजट डगमगाने वाला है।
सरकार का निर्णय: हाफ बिल योजना में बदलाव
राज्य सरकार पर गंभीर आरोप हैं कि हाफ बिजली बिल योजना में बदलाव करते हुए 400 यूनिट की सीमा समाप्त कर दी है। अब सभी उपभोक्ताओं को पूरी दर पर बिजली बिल चुकाना होगा। सरकार के इस फैसले के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया, लेकिन माना जा रहा है कि यह राजकोषीय दबाव या योजना के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया गया कदम हो सकता है।
कांग्रेस का सरकार पर हमला: जनहित में आज से हल्ला बोल
कांग्रेस इस निर्णय को सीधे-सीधे जनविरोधी और वादा खिलाफी बता रही है। कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि भाजपा ने चुनाव से पहले बिजली बिल हाफ करने का वादा किया था, लेकिन अब उसी पर यू-टर्न ले लिया है। कांग्रेस का कहना है कि यह फैसला गरीबों और किसानों को बर्बाद करने वाला है। पार्टी इसे जनता के साथ धोखा और जनादेश का अपमान मान रही है। कांग्रेस इस निर्णय को वापस लेने की मांग कर रही है और कहा गया है कि अगर सरकार ने कदम पीछे नहीं खींचे, तो राज्यभर में आक्रोश और तेज होगा।
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जनता की परेशानी: हर यूनिट की मार
बता दें कि 2018 में कांग्रेस की सरकार बनाने के बाद निर्णय लेकर 400 यूनिट तक बिजली उपयोग पर उपभोक्ताओं को राहत दी थी। अब यह छूट हटा ली गई है, जिससे आम उपभोक्ताओं को 500 से 1000 रुपए तक अधिक बिल भरना पड़ेगा। साथ ही स्मार्ट मीटर लगाए जा रहे हैं, जिससे बिजली बिल और बढ़कर आएंगे। इससे ग्रामीण क्षेत्रों, किरायेदारों, दुकानदारों और खेतिहर परिवारों पर इसका सीधा असर दिख रहा है। सरकार की इस चुप्पी से भ्रम और बढ़ गया है।
क्या यह सिर्फ सियासत है
कांग्रेस इस मुद्दे पर मुखरता से लड़ रही है। सदन के बाद अब सड़क पर आंदोलन करने के मूड में नजर आ रही है। इन आंदोलनों के पीछे सियासी ज़मीन तैयार करना भी माध्यम हो सकता है। क्योंकि हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के घर पर प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारकर उनके बेटे चैतन्य बघेल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। वहीं अब माना जा रहा है कि अगली कार्रवाई भूपेश बघेल पर भी हो सकती है, ऐसे में कांग्रेस जो पहले ही कोल ब्लॉक आबंटन और छत्तीसगढ़ के जंगलों की कटाई के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठा रही थी उसको सरकार ने बैठे बिठाए बिजली बिल बढ़ोतरी और राहत को समाप्त करने का मुद्दा दे दी है। बहरहाल कांग्रेस का प्रदर्शन अपनी जगह है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जनता की परेशानी वास्तविक रूप में बढ़ने वाली है। महंगाई के दौर में बिजली बिल का बोझ आम आदमी को तोड़ने वाली है। ऐसे में कांग्रेस की पहल को महज सियासत की राजनीतिक बताना जल्दबाजी होगी। क्योंकि सरकार की ओर से अब तक इस फैसले के पीछे की वजह या राहत पैकेज की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, जिससे जनता की असंतुष्टि और विपक्ष के आरोप दोनों को बिजली बिल पर बल मिल रहा है।
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कांग्रेस का आंदोलन: दो चरणों में विरोध की रणनीति बनी
कांग्रेस के तरफ से 06 अगस्त को सभी जिला मुख्यालयों में पत्रकार वार्ता की जाएगी। जिसमें बिजली बिल की समस्या, सरकार की नीति और जनता पर पड़ रहे असर को उजागर किया जाएगा। पार्टी के जिला पदाधिकारी, विधायक, पूर्व विधायक, सोशल मीडिया टीम और मोर्चा संगठन इसमें शामिल होंगे। वहीं 07 अगस्त को जिले-जिले में बिजली कार्यालयों के बाहर विरोध प्रदर्शन और भाजपा सरकार का पुतला दहन होगा। इस दिन पार्टी सड़कों पर उतरकर जनता के गुस्से को आवाज देगी। आंदोलन की रिपोर्ट पीसीसी कार्यालय को भेजी जाएगी।
सरकार की चुप्पी या रणनीति
सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है कि योजना में यह बदलाव क्यों किया गया। न ही कोई ऐसा वैकल्पिक उपाय सुझाया गया है जो आम जनता को राहत दे सके। अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार यह मान चुकी है कि जन समर्थन उनके साथ है और यह आंदोलन केवल दिखावा है? या फिर सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर नई रणनीति बना रही है? यह अभी साफ नहीं है। इधर बात की जाए राज्य के राजकीय कोष खाली हैं, जीएसटी, शराब और खनिज को छोड़ दिया जाए तो बिजली है जिससे सीधे राजस्व सरकार को मिलती है। अब जबकि कई सौ करोड़ रुपए सरकार को महतारी वंदन की किश्त में, किसान सम्मान निधि, मुफ्त राशन में खर्चने पड़ रहे हैं तो राजकीय कोष और तेजी से खाली हो रहे हैं। माना जा रहा है कि इस वजह से भी सरकार बिजली बिल हाफ योजना को बंद करने वाली है।
बिजली बिल पर गरमाई सियासत, राजनीति बनाम जनहित
इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस जहां खुद को जनता की आवाज़ बता रही है, वहीं सरकार की चुप्पी उसके ऊपर अहंकारी और जनविरोधी छवि का खतरा खड़ा कर रही है। जनता के बीच से भी आवाज़ें उठ रही हैं कि “बिजली का बिल पहले manageable था, अब बहुत ज्यादा आने वाला है। क्योंकि जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तब भाजपा ने कोयला ब्लॉक आबंटन घोटाला का मुद्दा बनाई थी। जिसके बाद 2014 में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। वर्तमान में बीजेपी पर आरोप लग है कि सरकार लगातार कोल ब्लॉक को निजी कंपनी को सौंप रही है। खासकर उन कंपनी को दे रही है जिसके संचालक सरकार के करीबी हैं।
बिल में बदलाव करना जनता के लिए आर्थिक झटका देना है
बिजली बिल में बदलाव से आमजन को सीधा आर्थिक झटका लगा है। कांग्रेस इसका राजनीतिक विरोध कर रही है क्योंकि मुद्दा जन-जीवन से जुड़ा है। सरकार की चुप्पी, कांग्रेस की आक्रामकता और जनता की पीड़ा—तीनों मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि मामला केवल राजनीति नहीं, नीतिगत पारदर्शिता और जन संवाद का है।
अब सबकी निगाहें 6-7 अगस्त पर टिकी हैं—जब कांग्रेस सड़क पर होगी और सरकार को जनता के सवालों का सामना करना पड़ सकता है।
आप अपनी राय कमेंट बॉक्स में बताएं। आपको क्या लगता है राज्य की सरकार का निर्णय उचित है या अनुचित। कांग्रेस का प्रदर्शन करना सही है या गलत। जनता की समस्या बढ़ेगी या सरकार का निर्णय सही साबित होगा।
Author: Deependra Shukla
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