
राजस्व सचिव से नहीं बनी सहमति: सम्मान, सुविधा और सुरक्षा के लिए अनिश्चितकालीन हड़ताल पर गए कनिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी
प्रशासनिक रिपोर्टर | बलौदा बाजार
सम्मान, सुविधा और सुरक्षा—ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की नींव हैं, जिसे वे संभालते हैं। वे, जिनके फैसले ज़मीन पर असर छोड़ते हैं। लेकिन जब वही लोग लगातार अनसुने किए जाएं, तो क्या वे चुप रहेंगे? उन्होंने कहा है: हम कार्य के लिए सदैव तत्पर हैं, पर अब कुछ शर्तों के साथ।

यह कहानी है छत्तीसगढ़ के तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों की—जो पिछले कई हफ्तों से अपनी 17 सूत्रीय मांगों को लेकर आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। शासन की ओर से 30 जुलाई तक कोई ठोस पहल नहीं होने पर, 31 जुलाई से छत्तीसगढ़ कनिष्ठ प्रशासनिक सेवा संघ ने “संसाधन नहीं तो काम नहीं” के सिद्धांत पर प्रदेशव्यापी अनिश्चितकालीन हड़ताल का एलान कर दिया।
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संघ के प्रांताध्यक्ष कृष्णकुमार लहरे के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने सचिव, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग अविनाश चंपावत से 1.30 घंटे लंबी चर्चा की। संघ ने सभी 17 मांगों की वस्तुनिष्ठ जानकारी दी, जिनमें कुछ को शीर्ष प्राथमिकता दी गई है—जैसे हर तहसील में तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता, सरकारी वाहन व चालक की व्यवस्था, 50:50 पदोन्नति नीति की बहाली, ग्रेड-पे में सुधार, न्यायिक कार्यों में सुरक्षा और अनुचित कार्यवाही पर न्यायिक संरक्षण।
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चर्चा सकारात्मक तो रही, लेकिन नतीजा वही पुराना—पत्राचार और डाटा संकलन की बात। संघ ने इसे अस्पष्ट व असफल वार्ता करार दिया और हड़ताल यथावत रखने का निर्णय दोहराया।
बलौदाबाजार-भाटापारा के जिला अध्यक्ष पेखन टोण्ड्रे ने स्पष्ट कहा, “हम कार्य के लिए तत्पर हैं, लेकिन सम्मान, सुविधा और सुरक्षा के बिना नहीं।” उनका दो टूक संदेश है—“काम चाहिए तो संसाधन दीजिए, नहीं तो जिम्मेदारी शासन की होगी।”
अब इस हड़ताल का असर केवल दफ्तरों तक सीमित नहीं रहेगा—नामांतरण, सीमांकन, न्यायालयीन कार्य, पटवारी नियंत्रण से लेकर सरकारी योजनाओं तक—हर स्तर पर काम प्रभावित होने की आशंका है। जनता और शासन दोनों के लिए यह परीक्षा की घड़ी है। इसमें सबसे ज्यादा जनता परेशान होने वाली है, क्योंकि तहसील कार्यालय में नायब तहसीलदार और तहसीलदार नहीं होंगे। ऐसे में जमीन से जुड़े सभी मामले लंबित हो जाएंगे।
इस संबंध में जब राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा से बात की गई तो उन्होंने कहा कि छोटी छोटी मांगे हैं चर्चा कर समाधान कर लिया जाएगा। लेकिन चर्चा अब असफल रही, अधिकारी प्रदर्शन से हड़ताल और अब अनिश्चित काल के लिए हड़ताल पर जा चुके हैं। एक तरह से इसे जहां प्रशासनिक असफलता माना जा रहा है, वहीं सरकारी उदासीनता का इसे नायाब नमूना बताया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि प्रदेश में कांग्रेस सरकार के समय 50-50 अनुपात को बिगाड़ा गया, जो अब भी जारी है। जबकि सरकार से कई बार मांग किया जा चुका है, इसके अलावा संसाधनों की भारी कमी तहसील कार्यालयों में है। ई ऑफिस की शुरुआत कर तो दी गई लेकिन न ऑपरेटर हैं न कार्यालयों में जरूरत की संख्या के मुताबिक बाबुओं की मौजूदगी है, ऐसे में काम करना कठिन नहीं मुश्किल हो गया है।
अब देखने की बात होगी कि राजस्व विभाग के उच्च अधिकारी किस तरह से इस पर निर्णय लेते हैं और सरकार का कदम क्या होता है। बहरहाल तहसील कार्यालय सुने पड़े हैं।
Author: Deependra Shukla
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