चेक बाउंस होने पर आरोपी को 6 माह की सजा: 7 लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश

चेक बाउंस होने पर आरोपी को 6 माह की सजा: 7 लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश

लीगल रिपोर्टर | बलौदा बाजार

बलौदा बाजार में सात लाख रुपये के चेक बाउंस के मामले में न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए छह माह के कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही परिवादी को सात लाख रुपए प्रतिकर के रूप में देने का आदेश दिया है। यह फैसला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी बलौदा बाजार पूजा चन्द्रा की अदालत ने सुनाया। मामले में परिवादी की ओर से अधिवक्ता महान मिश्रा ने पैरवी की।

चेक बाउंस होने पर आरोपी को 6 माह की सजा: 7 लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश
आरोपी राकेश कुमार गुप्ता।

पंकज यदु ने अधिवक्ता महान मिश्रा के माध्यम से परिवाद दायर किया। इसके मुताबिक पंकज यदु और राकेश कुमार गुप्ता के बीच अच्छी जान-पहचान और मित्रता थी। राकेश ने घरेलू काम के लिए 15 जनवरी 2025 को परिवादी से सात लाख रुपए उधार मांगे थे। तीन महीने के भीतर रकम लौटाने का आश्वासन मिलने पर परिवादी ने 30 जनवरी 2025 को उसे सात लाख रुपये नकद दिए थे।

अदालत का फैसला 👉 171a98b2d3e0dc3caf56f2c4a76ff00b

निर्धारित अवधि बीतने के बाद भी जब आरोपी ने रकम वापस नहीं की तो परिवादी ने उससे पैसे मांगे। इस पर आरोपी ने 30 जून 2025 की तारीख वाला भारतीय स्टेट बैंक, रवान शाखा के अपने खाते का सात लाख रुपये का चेक परिवादी को दिया। परिवादी ने चेक को अपने केनरा बैंक खाते में भुगतान के लिए जमा किया, लेकिन 1 जुलाई 2025 को अपर्याप्त राशि (Funds Insufficient) के कारण चेक अनादरित हो गया।

इसके बाद परिवादी ने अधिवक्ता महान मिश्रा के माध्यम से 28 जुलाई 2025 को आरोपी को कानूनी नोटिस भेजा। आरोपी ने डाक से भेजे गए नोटिस को लेने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद उसने निर्धारित अवधि में चेक की राशि का भुगतान नहीं किया। इसके बाद 12 सितंबर 2025 को न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया गया।

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सुनवाई के दौरान राकेश ने सात लाख रुपए उधार लेने से पहले इनकार किया। उसका कहना था कि उसने परिवादी को कोई चेक नहीं दिया था। हालांकि, प्रतिपरीक्षण के दौरान उसने चेक और उस पर किए गए हस्ताक्षर अपने होने की बात स्वीकार की।

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न्यायालय ने पाया कि आरोपी अपने बचाव के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेजी या अन्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। न्यायालय ने परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 118 और 139 के कानूनी प्रावधानों तथा सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न न्याय दृष्टांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किए जाने के बाद ऋण या दायित्व की कानूनी उपधारणा उत्पन्न होती है। आरोपी इस उपधारणा का प्रभावी खंडन करने में असफल रहा।

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न्यायालय ने आरोपी राकेश कुमार गुप्ता को परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत दोषसिद्ध ठहराते हुए छह माह के साधारण कारावास से दंडित किया। साथ ही बीएनएसएस की धारा 395(3) के तहत परिवादी को सात लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश दिया।

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Author: UnfearNews

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