छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 14 साल बाद कई सब-इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द

हाईकोर्ट बिलासपुर का बड़ा फैसला: 67 उप अभियंताओं की नियुक्तियां रद्द, 2011 की भर्ती प्रक्रिया अवैध करा

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 14 साल बाद कई सब-इंजीनियरों की नियुक्ति रद्द

साहब, हमारे देश में सरकारी नौकरी एक बार लग जाए तो उसे ‘अमरत्व’ का वरदान मान लिया जाता है, जैसे कि अब ब्रह्मा भी आ जाएं तो कुर्सी से नहीं हिला सकते। लेकिन छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मुगालते को तोड़ दिया है और साबित कर दिया है कि कानून के हाथ वाकई लंबे होते हैं, भले ही उन्हें पहुंचने में 14 साल लग जाएं। बिलासपुर में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने सरकारी सिस्टम की नींद उड़ा दी है। किस्सा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का है, जहां साल 2011 में सब-इंजीनियर्स की भर्ती का एक ‘मेला’ लगा था। नियम तो कहते थे कि 23 मार्च 2011 तक जिसके हाथ में डिग्री हो, वही साहब बनेगा। लेकिन हमारे यहाँ नियमों में ‘जुगाड़’ की गुंजाइश हमेशा निकाल ली जाती है। नतीजा यह हुआ कि जिनके पास उस तारीख तक डिग्री का अता-पता नहीं था, वे भी कुर्सी पर जम गए और पूरे 14 साल तक मजे से वेतन उठाते रहे।

उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला
छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट।

204200006612025_6 आदेश की कॉपी देखें।

इस ‘शांतिपूर्ण अन्याय’ में खलल डाला याचिकाकर्ता रवि तिवारी और उनके वकील एडवोकेट शाल्विक तिवारी ने। आम तौर पर लोग सोचते हैं कि जब सिस्टम अपनी चाल चल रहा हो तो बीच में क्यों आना, लेकिन एडवोकेट शाल्विक तिवारी ने हाई कोर्ट में यह जिद ठान ली कि अगर नींव ही गलत है, तो इमारत चाहे कितनी भी पुरानी हो जाए, उसे गिरना ही होगा। उन्होंने कोर्ट के सामने ‘को वारंटो’ (Quo Warranto) का तर्क रखा, जिसका सीधा सा मतलब है—”भाई साहब, आप किस हक से इस कुर्सी पर बैठे हैं?” उधर से दलीलें दी गईं कि अब तो 14 साल हो गए, बाल पक गए नौकरी करते-करते, अब क्या हटाना। लोग पक्के (कन्फर्म) भी हो गए थे। लेकिन कोर्ट ने एडवोकेट शाल्विक तिवारी की इस बात को माना कि सहानुभूति अपनी जगह है और कानून अपनी जगह। अगर खेल शुरू होने से पहले आपके पास टिकट नहीं था, तो अब आप यह नहीं कह सकते कि मैंने पूरी फिल्म देख ली है इसलिए मुझे हॉल में बैठने दिया जाए।

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फैसला कड़ा आया। कोर्ट ने प्राइवेट रेस्पोंडेंट्स नंबर 4 से 73 की नियुक्तियों को, जो 2011 की कट-ऑफ डेट के बाद की डिग्री लेकर आए थे, सिरे से खारिज कर दिया। इसे कानून की भाषा में ‘वॉयड एब इनिशियो’ यानी ‘शुरुआत से ही शून्य’ कहा गया। मतलब यह कि वे कभी नौकरी में थे ही नहीं, बस एक भ्रम था जो अब टूट गया है। हालांकि, कोर्ट की पारखी नजर ने दो लोगों, वर्षा दुबे और अभिषेक भारद्वाज, को इस गाज से बचा लिया क्योंकि उनके कागज समय रहते पूरे थे। बाकी सबकी कुर्सी खिसक गई है। एडवोकेट शाल्विक तिवारी की यह जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि उन्होंने उस धारणा को तोड़ा है कि समय बीतने के साथ पाप धुल जाते हैं।

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अंत में, जैसा कि अक्सर होता है, गलती सिस्टम की भी मानी गई। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने ही आंख मूंदकर भर्तियां की थीं, तो अब इन कर्मचारियों से 14 साल के वेतन की वसूली करना ज्यादती होगी। रिकवरी तो रोक दी गई है, लेकिन संदेश साफ है—रवि तिवारी की याचिका और हाई कोर्ट के डंडे ने बता दिया है कि पिछले दरवाजे से या नियमों को ताक पर रखकर पाई गई सफलता की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती, वह कभी भी छिन सकती है। न्याय देर से आया, लेकिन दुरुस्त आया।

 

नोट: हाईकोर्ट के आदेश के बाद यह लेख unfearnews.com के एक सुधि पाठक ने लिखी है। हालांकि उन्होंने इस लेख को प्रकाशित करते समय अपने नाम का प्रकाशन नहीं करने का निवेदन किया गया है।

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Author: UnfearNews

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