देश की दिशा क्या है, किस मोड पर हैं हम जो विकास के नाम पर तबाही कर रहे हैं
सरकारें विकास के बड़े-बड़े दावे तो कर रही हैं, लेकिन धरातल की सच्चाई इससे बिल्कुल उलट दिखाई देती है। जहां कहा जाता है आतंकवाद कंट्रोल में है वहीं दिल्ली के धमाके की शोर से पूरा सिस्टम सिहर उठता है। जब कहते हैं विकास हो रहा है तो जंगल सिहर उठते हैं। कभी गौरैया, बुलबुल, मैना और कोयल की आवाज से बचपन खिल उठता था, आज हम इस कदर अंधाधुंध पेड़ों की कटाई कर विकास की दौड़ में निकल पड़े हैं कि हमें विलुप्त हो रही पक्षियों, पेड़ों की प्रजातियों और मानव सभ्यताओं का भान तक नहीं है। आज देश के हालात ऐसे हैं कि हम खड़े तो हैं एक मोड़ पर जहां कहने के लिए विकास तो हुआ है, लेकिन दिखाई नहीं दे रहा है।

अस्पतालों की दीवारें लगातार खड़ी होती जा रही हैं, लेकिन उन दीवारों के पीछे दर्द की चीख बढ़ती जा रही है क्योंकि अस्पतालों में चिकित्सकों के साथ दवाइयां नहीं हैं, लोग इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं, सरकार और प्रशासन चुप है। यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें व्यक्ति बिना इलाज के मर जाए, लेकिन जिम्मेदारों की जवाबदेही तय न की जाए? उदाहरण हैं आंखफोड़वा, नसबंदी कांड। जनता टैक्स देती है, अस्पताल बनते हैं, लेकिन दवा की जगह खाली रैक और मरीजों की हर तरफ से कराह सुनाई देती है।
लगातार कोयला खदानें स्वीकृत हो रही हैं, इसके बाद भी बिजली के दाम इस कदर बढ़ा दिए गए हैं कि घरों में रौशनी भी फीकी लगने लगी है। ऐसे हालात हैं कि सर्वाधिक कोयला और बिजली उत्पादन करने वाले राज्य में सरकार घर-घर सोलर प्लांट स्थापित करवा रही है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार इस बढ़ती महंगाई के बीच जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके साथ ही इधर अब जमीन और रजिस्ट्री की फीस में बेतहाशा वृद्धि कर सरकार ने आम लोगों का घर बनाने का सपना छीन लिया है। पहले लोग हर छोटी-बड़ी बचत कर घर बनाने के लिए धन जुटाते थे, लेकिन सरकार के एक फैसले ने आज हालात ये किए हैं कि जमीन का दाम मध्यम वर्ग की पहुंच से बहुत दूर निकल चुका है। सरकार के फैसलों ने लोगों का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है। रजिस्ट्री की फीस इतनी बढ़ा दी गई है कि अपना घर बनाना अब एक सपने की तरह है—जो शायद कभी पूरा न हो सके।
जंगल काटे जा रहे हैं, नदियां सूख रही हैं, भूजल स्तर गिर चुका है और हम पानी खरीदने को मजबूर हैं। ऐसा लगता है कि वह समय दूर नहीं जब हमें हवा भी खरीदनी पड़ेगी। विकास के नाम पर पेड़ों का नरसंहार और पहाड़ों की खुदाई जारी है। जनता के पैसे से सरकारी इमारतें बनती हैं, फिर कुछ महीनों बाद तोड़ दी जाती हैं—तो यह खर्च किसकी जेब से निकला और इसकी सजा किसे मिली? हर गलती पर जनता सजा भुगते, और गलती करने वाले अधिकारी मौज करते रहें—यह न्याय नहीं।
हाल ही में देश के सबसे खूंखार नक्सली माड़वी हिड़मा के मारे जाने की खबर आई। यह वह व्यक्ति था जिसने सैकड़ों जवानों और निर्दोष नागरिकों की हत्या की, देश के खिलाफ हथियार उठाए और आतंक फैलाया। उसके मारे जाने पर देश को राहत मिलनी चाहिए थी, लेकिन हैरानी की बात है कि दिल्ली में कुछ संगठनों ने उसके समर्थन में प्रदर्शन किया। सवाल यह है कि क्या यह आतंक का समर्थन नहीं? क्या देश के खिलाफ हथियार उठाने वालों को महिमामंडित करना लोकतंत्र है? ऐसे प्रदर्शन करने वाले वास्तव में नक्सलवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और आदिवासियों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार को इस पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।
लेकिन साथ ही यह भी सच है कि हमें हिड़मा की मौत पर खुशी मनाते हुए यह भी याद रखना चाहिए कि बस्तर के जंगल अब खनिज लूट के केंद्र में बदलते जा रहे हैं। सरगुजा के जंगलों की हालत देखकर समझ आता है कि सरकारें खनिज संपदा के लिए किस हद तक जंगलों को तबाह कर सकती हैं। सवाल यह है—क्या बस्तर भी आने वाले समय में कंक्रीट के मैदान में बदल दिया जाएगा?
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देश में कब तक विकास के नाम पर विनाश होता रहेगा? कब तक जनता रोयेगी और सरकार चुप रहेगी? कब तक जंगल कटेंगे, और कब तक सपने मरेंगे? देश को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो सिर्फ अमीरों के हितों की रक्षा न करें, बल्कि आम इंसान को जीने का अधिकार दें। वरना भविष्य सिर्फ सवालों और संघर्ष का ही होगा।
लेख
Author: Deependra Shukla
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