बुलेट से फूट रहे पटाखे पर है प्रशासन की चुप्पी: क्या जांच के नाम पर खानापूर्ति कर रही है बलौदा बाजार पुलिस
क्राइम रिपोर्टर|बलौदा बाजार
बुलेट से फूटते पटाखों की गूंज अब सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बलौदा बाजार की कानून-व्यवस्था पर सीधा तमाचा बन चुकी है। रात होते ही अमानक साइलेंसर लगी बुलेटें गोली जैसी आवाज के साथ दहशत फैलाती हुई दौड़ती हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश के सबसे संवेदनशील जिलों में गिने जाने वाले बलौदा बाजार जिला के मुख्यालय में पुलिस की मौजूदगी नदारद नजर आती है। सवाल यह नहीं कि शोर क्यों है, सवाल यह है कि जब हर रात वही चेहरे, वही बाइक और वही रास्ते हैं, तो फिर वे लोग पकड़े क्यों नहीं जा रहे हैं? और इस जांच के नाम पर कब तक खानापूर्ति चलती रहेगी?

शहर की सड़कों पर अब रात का सन्नाटा नहीं, बल्कि बुलेट से निकलती गोली और पटाखे जैसी आवाजें कानून-व्यवस्था की पोल खोल रही हैं। हर रात करीब 10.30 बजे बलौदा बाजार–भाटापारा मार्ग पर असामाजिक तत्व बुलेट बाइक से पटाखे फोड़ते हुए खुलेआम दहशत फैलाते नजर आ रहे हैं, लेकिन पुलिस की मौजूदगी सवालों के घेरे में है। कोतवाली थाना के सामने से पूरे शहर को बहरा करते हुए तेज आवाज वाली बुलेट हर रात निकलती है और मजाल है कि पुलिस के कान तक उसकी आवाज पहुंचे। कुछ समय पहले तक पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल की नेतृत्व वाली पुलिसिंग कहीं नोटों के नीचे दबकर रह सी गई नजर आती है। क्योंकि जिन जगहों पर पुलिस की विजिबिलिटी दिखनी चाहिए वहां पुलिस चालान काटने में मस्त नजर आती है। पुलिस का काम शराब की बोतलों की खनक और चालान के नोटों और पर्चियों की फड़फड़ाहट तक सीमित हो गई सी नजर आती है। यहां पुलिस भूल जाती है कि यह वही बलौदा बाजार है जिसे पुलिस पर गलत विवेचना के आरोप लगे, पुलिस अधीक्षक कार्यालय तक को असामाजिक तत्वों ने जला डाला था। यह मामला अब भी अदालतों में है और अब फिर एक बार पुलिस उसी ढर्रे पर चल निकली है।

अब तो स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि हर रात पुलिस अंधेरे में गुम हो जाती है। क्योंकि पिछले कई माह से बुलेट की आवाज सड़कों पर हर रात गूंजती है, उससे पटाखे और गोली चलने की आवाज भी आती है लेकिन मजाल है कि पुलिस शहर में लगी सीसीटीवी से कभी उस बुलेट चालक का नंबर निकालकर चलानी कार्रवाई करने का कोई विज्ञप्ति पुलिस मीडिया ग्रुप में डालती हो। कार्रवाई की खबरें और वाहवाही लेने वाले समाचार से पटे रहने वाले इस ग्रुप में कभी भी इस तरह की कार्रवाई का जिक्र नहीं किया जाता कि पुलिस ने रात के अंधेरे में बुलेट से पटाखा और गोली की आवाज निकालकर दहशत फैलाने वाले व्यक्ति को पकड़ा गया और उसके खिलाफ चलानी कार्रवाई की गई है।
क्योंकि कोई एक-दो दिन की घटना नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा सिलसिला है। इसके बावजूद न तो ठोस कार्रवाई दिख रही है और न ही ऐसे तत्वों पर लगाम लग पा रही है। पुलिस जांच की बात जरूर करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यही है कि यह जांच महज खानापूर्ति बनकर रह गई है। बता दें कि बलौदा बाजार की पुलिस पर वसूली के आरोप पहले से हैं, अब कानून-व्यवस्था भी ढीली पड़ गई है, इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि पुलिस अपने कार्यालयों तक सीमित होकर रह गई है।
बलौदा बाजार पुलिस पहले ही वसूली जैसे गंभीर आरोपों को लेकर सवालों में है। अब जब शहर की सड़कों पर खुलेआम हुड़दंग और डर का माहौल बन रहा है, तो पुलिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठना लाजमी है। सवाल यह है कि जब असामाजिक तत्व रोजाना एक ही समय, एक ही मार्ग पर उत्पात मचाते हैं, तो पुलिस को इसकी भनक क्यों नहीं?
कहां है विजिबिलिटी पुलिसिंग?
जिस ‘विजिबिलिटी पुलिसिंग’ का दावा किया जाता है, वह अब सिर्फ चालान काटने तक सीमित नजर आ रही है। हेलमेट, कागजात और जुर्माने की कार्रवाई तो दिखती है, लेकिन अपराध और असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाने में वही सख्ती गायब है। शाम होते ही चौक-चौराहों पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा आम बात हो गई है।
नशे की गिरफ्त में युवा, गांव-गांव तक जहर स्थिति और भी गंभीर तब हो जाती है जब नशे का जाल शहर से निकलकर गांव-गांव तक फैलता दिख रहा है। युवा तेजी से नशे की गिरफ्त में फंस रहे हैं, लेकिन न तो बड़े अभियान नजर आते हैं और न ही लगातार दबिश की खबरें। जो अभियान चलाया भी जा रहा है वह भी आधा अधूरा छोड़ दिया जाता है।नशा, हुड़दंग और दहशत—तीनों मिलकर समाज को खोखला कर रहे हैं।
जिम्मेदारी आखिर किसकी?
शहर की कानून-व्यवस्था बनाए रखना किसकी जिम्मेदारी है—यह सवाल अब आम नागरिक पूछ रहा है। क्या पुलिस केवल कागजी कार्रवाई और चालान तक सीमित रहेगी, या फिर सड़कों पर दिखकर अपराधियों के हौसले पस्त करेगी? बलौदा बाजार की जनता जवाब चाहती है—बुलेट से निकलती ‘गोली’ पर कब लगेगी लगाम और पुलिस की चुप्पी कब टूटेगी?
Author: UnfearNews
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